दूसरे महायुद्ध के दौरान, बर्मा के घने जंगलों में सिपाहियों का एक जत्था युद्ध कर रहा था। महीनों से उन्होंने किसी स्त्री का चेहरा नहीं देखा था। एक दिन दोपहर में एक तोता जोर से चिल्लाते हुए उड़ रहा था, "बड़ी सुंदर युवती है, अत्यंत सुंदर युवती है!" सिपाही, जो लंबे समय से स्त्री की झलक के लिए तरस रहे थे, अपनी बंदूकें छोड़कर उस तोते का पीछा करने लगे। वे झाड़ियों को पार करते हुए उस जगह पहुंचे, जहां तोता उड़ते-उड़ते रुका था। पर वहां कोई युवती नहीं थी। वहां एक मादा तोता थी, जिसकी ओर वह नर तोता आकर्षित था। सिपाही अपना सिर पीटते हुए सोचने लगे कि वे किस नासमझी में पड़ गए!
यह घटना एक महत्वपूर्ण सत्य को उजागर करती है। नर तोता मादा तोते में रस अनुभव करता है, लेकिन सिपाहियों के लिए उसमें कोई आकर्षण नहीं था। इसी प्रकार, पुरुष को स्त्री में और स्त्री को पुरुष में रस मिलता है। यह रस बाहरी नहीं होता, बल्कि हमारी अपनी भावदशा में होता है। जैसे, बुखार के बाद स्वादिष्ट भोजन भी बेस्वाद लगता है, क्योंकि हमारी जीभ की स्वाद लेने की क्षमता बदल जाती है। भोजन में स्वाद नहीं होता, स्वाद हमारी जीभ की क्षमता में होता है।
जीवन का असली रस वस्तुओं या विषयों में नहीं होता, बल्कि हमारे भीतर होता है। जब तक हम इसे बाहरी चीजों में खोजते रहेंगे, हम भटकते रहेंगे। हमें समझना होगा कि हम ही उस रस को वस्तुओं में प्रक्षेपित करते हैं। जिस दिन हमें यह एहसास होगा, उस दिन से हमारे जीवन में क्रांति शुरू हो जाएगी। तब हमें रस को खोजने के लिए अपने भीतर की गहराई में जाना होगा, बाहर नहीं।