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रामानुज की परख

सुबह की प्रार्थना के स्वर मंदिर में गूंज रहे थे। आचार्य रामानुज प्रभु की प्रार्थना में तल्लीन होकर मंदिर की परिक्रमा कर रहे थे। तभी एक चांडाल स्त्री उनके रास्ते में आ गई। उसे देखकर आचार्य के कदम ठिठक गए। प्रार्थना में लीनता टूट गई और मुँह से क्रोधित शब्द निकल पड़े, "चांडालिन, मेरे मार्ग से हट! मेरे मार्ग को अपवित्र न कर!"

लेकिन वह स्त्री नहीं हटी। उसने हाथ जोड़कर पूछा, "स्वामी, मैं किस ओर सरकूं? प्रभु की पवित्रता तो चारों ओर ही है! मैं अपनी अपवित्रता किस ओर ले जाऊं?"

आचार्य रामानुज की आँखों के सामने मानो कोई परदा हट गया। उसके कुछ शब्द उनकी कठोरता को बहा ले गए। श्रद्धावनत होकर उन्होंने कहा, "माँ, क्षमा करो। भीतर का मैल ही हमें बाहर दिखाई देता है। जो भीतर की पवित्रता से आँखों को जांच लेता है, उसे चारों ओर पावनता ही दिखाई देती है। प्रभु को देखने का कोई और मार्ग नहीं है, एक ही मार्ग है, और वह है सब ओर पवित्रता का अनुभव करना। जो सब में पावन को देखने लगता है, वही परमात्मा की कुंजी पाता है। प्रकाश को अंधकार का पता नहीं होता। जिनके हृदय प्रकाश और पवित्रता से भरे होते हैं, उन्हें कोई हृदय अंधकार पूर्ण और अपवित्र नहीं दिखाई देता।"