एक ईसाई फकीर के दर्शन करने लोग दूर-दूर से आते थे। वह मिस्र के पास एक रेगिस्तान में एक गुफा में रहता था। उसकी तपश्चर्या और त्याग देखकर लोग बड़े चकित होते थे। एक दिन एक फकीर भी उसके दर्शन के लिए आया और हंसने लगा। उसने पूछा, "आप हंस क्यों रहे हैं?"
उस फकीर ने कहा, "मैं यह देख कर हंस रहा हूं कि तुमने अपने हाथों और पैरों में जंजीरें क्यों डाल रखी हैं?"
वह गुफा में रहने वाला फकीर बोला, "कभी-कभी मन में कमजोरी के क्षण आते हैं और भाग जाने का मन होता है। संसार में लौट जाने की इच्छा प्रबल हो जाती है। तब ये जंजीरें मुझे रोक लेती हैं। थोड़ी देर ही सही, लेकिन फिर मैं अपने को संभाल लेता हूं। ये जंजीरें खोलना आसान नहीं है, इसलिए मैंने इन्हें सदा के लिए बंद करवा दिया है। कमजोरी के क्षणों में ये सहारा बन जाती हैं।"
लेकिन यह भी कोई तरीका हुआ? जंजीरों के सहारे अगर रुके रहे गुफा में... और ऐसा नहीं है कि सभी संन्यासी इस तरह की स्थूल जंजीरें बांधते हैं, कुछ सूक्ष्म जंजीरें भी होती हैं। जैसे कोई जैन मुनि हो गया, तो बीस-तीस साल की प्रतिष्ठा, सम्मान, चरणस्पर्श, पूजा, आदर… ये सब जंजीरें बन जाती हैं। अब अगर वह अचानक लौटना चाहे तो यह सब सम्मान और आदर उसे रोक लेते हैं। अहंकार बाधा बन जाता है। यह बड़ी सूक्ष्म जंजीर है।
त्यागी को आदर दिया जाता है ताकि वह गुफा में ही रहे और बाहर न निकल सके। सम्मान की यह जंजीरें उसे रोक कर रखती हैं। यह संसारी की तरकीब है। जितना सम्मान दिया, उतना ही अपमान भी होगा। सम्मान जंजीर बन जाता है।
जंजीरों से रुके रहना, यह कोई रुकना नहीं हुआ। आनंद से रुको, जंजीरों से नहीं। अहोभाव से रुको, अपमान के भय और सम्मान की आकांक्षा से नहीं।
लेकिन यह तभी संभव होगा जब संसार को पूरी तरह से जी लो। अधूरे मत भागो; बीच से मत उठो; यह कहानी पूरी हो जाने दो। देख लो की इसमें कुछ सार नहीं है। अंतिम परदा गिर जाने दो। कहीं ऐसा न हो कि बीच से उठ जाओ और फिर मन सोचे कि असली दृश्य देखने को रह गया हैं।