एक बार मझधार में एक नाव डूबने को हो रही थी। तूफान जोर का था, आंधी भयंकर थी, और नाव छोटी थी। पानी भीतर आ रहा था, जिससे सभी लोग घुटने टेककर परमात्मा से प्रार्थना कर रहे थे।
लेकिन एक फकीर चुपचाप बैठा था। लोगों ने उस पर नाराजगी जताई और कहा, "तुम फकीर हो, तुम्हें तो हमसे पहले प्रार्थना करनी चाहिए। हो सकता है हमारी प्रार्थना न पहुंचे क्योंकि हमने पहले कभी प्रार्थना की ही नहीं। लेकिन तुम जो जिंदगीभर प्रार्थना में डूबे रहे हो, आज तुम्हें क्या हो गया है?"
फकीर हंसता रहा और प्रार्थना नहीं की। बाकी लोग प्रार्थना कर रहे थे। कोई कह रहा था कि वह हजार रुपये दान करेगा, तो कोई कह रहा था कि वह संन्यास ले लेगा और सब कुछ छोड़ देगा।
अचानक, फकीर चिल्लाया, "संभलो, इस तरह की बातें मत करो, किनारा दिखाई पड़ रहा है।" वास्तव में, तूफान की लहरें नाव को तेजी से किनारे की तरफ ले आई थीं। बस, सारी प्रार्थनाएं वहीं समाप्त हो गईं। लोग अधूरी प्रार्थनाओं के साथ उठ गए, अपना सामान बांधने लगे और परमात्मा को भूल गए।
तब फकीर प्रार्थना करने बैठा। लोग हंसने लगे और बोले, "तुम भी पागल मालूम होते हो। अब क्या प्रार्थना कर रहे हो? अब तो किनारा करीब आ गया है।"
फकीर ने कहा, "मेरा अनुभव है कि नावें मझधार में नहीं डूबतीं, किनारों पर डूबती हैं। मझधार में तो लोग सावधान रहते हैं; किनारों पर आकर वे बेहोश हो जाते हैं। मझधार में तो लोग प्रार्थनाएं करते हैं और परमात्मा को पुकारते हैं; किनारा करीब देखते ही वे परमात्मा को भूल जाते हैं।"