एक आदमी बोरीबंदर पर कुली का काम करता था। वह काफी कमा लेता था और रात को जमकर पीता था, खाना-पीना, मित्रों के साथ समय बिताना- इसके अलावा उसे और कुछ चाहिए भी नहीं था। वह जीवन में सीधा-सादा था, कोई जाल-उलझाव नहीं थे।
कभी-कभी जुआरी, शराबी, वेश्यागामी भी सीधे-सरल होते हैं, जबकि साधु, संन्यासी, महात्मा जटिल और उलझे हुए हो सकते हैं। अपराधियों में भी सरलचित्त लोग मिल सकते हैं, लेकिन महात्माओं में सरलचित्त मिलना कठिन होता है। महात्मा होना ही जटिलता का धंधा है।
वह आदमी मरा और सीधे स्वर्ग ले जाया गया। लेकिन वहां उसका दिल नहीं लगा। न रेलगाड़ियों का शोर, न यात्रियों का आना-जाना। उसकी जिंदगी बोरीबंदर की आवाजों और गतिविधियों में थी। स्वर्ग में उसने पूछा, "यहां क्या करना होगा? रेलगाड़ियां कहां हैं? बोरीबंदर कहां है?" देवताओं ने कहा, "यहां कोई रेलगाड़ियां नहीं चलतीं। यहां किसी को कहीं जाना ही नहीं है।"
उसने पूछा, "तो फिर करना क्या होगा?" देवताओं ने कहा, "यहां कुछ नहीं करना होता। बस राम-राम जपो।"
वह मजबूरी में बैठ गया, राम-राम जपने लगा। बीच-बीच में कहता, "ऐसी की तैसी! भाड़ में जाए!" राम को खबर लगी तो वे उसके सामने प्रकट हुए और कारण पूछा। उसने कहा, "आपसे क्या छिपाना, मुझे बोरीबंदर चाहिए। रेलगाड़ी के बिना मैं सो ही नहीं सकता। जब तक आवाज न हो, शोरगुल न हो, यात्री न आएं, सब खाली-खाली लगता है।"
राम ने कहा, "इसे वापिस बोरीबंदर भेजो। यहां तो यह मुझे गालियां दे रहा है। वहां कभी-कभी मुझे याद भी कर लेता था।"
तुम स्वर्ग भी चले जाओगे तो क्या करोगे? तुम तुम ही रहोगे। सवाल कहीं जाने का नहीं है, सवाल रूपांतरण का है। तुम जहां हो, वहीं जागने का है।
मनुष्य ने कितना ज्ञान अर्जित कर लिया है। शास्त्रों पर शास्त्र संगृहीत होते चले गए हैं। ब्रिटिश म्यूजियम की लाइब्रेरी में इतनी किताबें हैं कि अगर पृथ्वी पर अलमारियों की कतार रखी जाएं तो तीन चक्कर पूरी पृथ्वी के लग जाएंगे। रोज किताबें बढ़ती जाती हैं। रोज आदमी का ज्ञान बढ़ता जाता है और रोज आदमी की पीड़ा भी बढ़ती जाती है। रोज आदमी की छाती पर दुःख का पहाड़ भी बड़ा होता जाता है।
कहीं कोई चूक हो रही है। कहीं कोई मौलिक, कहीं जड़ में ही भूल हो रही है। जिसने स्वयं को नहीं जाना, उसका सब ज्ञान अज्ञान हो जाता है। जिसने स्वयं को जाना, उसका अज्ञान भी ज्योतिर्मय है। उसका कुछ न जानना भी अपूर्व है।