एक गांव में एक युवक था, जो नास्तिक था। गांव के लोग उसे समझा-समझाकर थक चुके थे। पंडितों ने तर्क-वितर्क किए, लेकिन युवक सभी तर्कों का खंडन कर देता। कोई भी तर्क ऐसा नहीं होता जिसे खंडित न किया जा सके। आखिरकार, पंडितों ने उसे संत एकनाथ के पास जाने की सलाह दी।
युवक संत एकनाथ के पास पहुँचा। उसने देखा कि एकनाथ शिव मंदिर में सो रहे थे और उनके पैर शिवलिंग पर टिके थे। यह देखकर युवक चौंक गया। उसने सोचा कि यह व्यक्ति तो महानास्तिक है। युवक ने संत एकनाथ से पूछा, "आप साधुपुरुष हैं, फिर शिवलिंग पर पैर क्यों टिकाते हैं, सुबह कब की हो गई है, आप ब्रह्ममुहूर्त में क्यों नहीं उठते?"
संत एकनाथ ने हँसते हुए उत्तर दिया, "जहाँ भी मैंने पैर रखे, वहाँ परमात्मा ही पाया। इसलिए, जहाँ भी पैर टिकाऊ, कोई फर्क नहीं पड़ता। जिसने सत्य को जान लिया उसके लिए किसी विशेष नियम का पालन करना जरूरी नहीं रह जाता, वह तो सब नियमो के पार हो जाता है। मेरे लिए यहाँ पैर रखकर सोना सुखदायक है, इसलिए यहाँ पैर रखे हैं। और बात रही ब्रह्ममुहूर्त में उठने की तो जब भीतर का ब्रह्म जागता है, वही ब्रह्ममुहूर्त है।"
युवक को संत की बातों से आश्चर्य हुआ। उसे संत का व्यक्तित्व अद्भुत लगा। उसने समझा कि संत एकनाथ के लिए परमात्मा कोई सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन का एक हिस्सा है। सच्ची भक्ति और ईश्वर का अनुभव नियमों और तर्कों से परे है। परमात्मा केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि समष्टि है, उसमें सब कुछ शामिल है, वे नियम और संस्कार भी जिन्हे हम गलत मानते है।