एक प्रेमी था, जो दूर देश चला गया था। उसकी प्रेयसी उसकी राह देखती रही। कई वर्ष बीत गए। उसके पत्र आते थे, जिनमें वह जल्दी ही वापस लोटने के बारे में लिखता था। प्रतीक्षा लंबी होती गई, लेकिन वह नहीं आया। आखिरकार, एक दिन प्रेयसी ने स्वयं उस जगह जाने का निर्णय लिया जहां उसका प्रेमी था। वह उसके द्वार पर पहुंची, द्वार खुला था, और वह भीतर चली गई। प्रेमी कुछ लिख रहा था। वह चुपचाप उसके सामने बैठकर देखने लगी। प्रेमी उसी प्रेयसी को पत्र लिख रहा था। वह बड़े प्रेम की बातें, गीत, और कविताएं लिख रहा था। वह लिखते ही जा रहा था, उसे यह भी पता नहीं चला कि उसके सामने कौन बैठा है। आधी रात हो गई और तब कहीं जाकर वह पत्र पूरा हुआ। प्रेमी ने जब अपनी आँखें ऊपर उठाई, तो वह घबरा गया। उसे समझ नहीं आया कि सामने कौन है। उसने सोचा, क्या यह कोई भूत-प्रेत है? फिर उसने देखा, यह तो उसकी प्रेयसी है। वह चिल्लाने लगा, "नहीं-नहीं, यह कैसे हो सकता है? तू यहाँ कैसे आई?" उसकी प्रेयसी ने कहा, "मैं घंटों से बैठी हूं और प्रतीक्षा कर रही हूं कि जब तुम्हारा लिखने का काम बंद हो, तो शायद तुम्हारी आंखें मेरे पास पहुंचें।...
दूसरे महायुद्ध के दौरान, बर्मा के घने जंगलों में सिपाहियों का एक जत्था युद्ध कर रहा था। महीनों से उन्होंने किसी स्त्री का चेहरा नहीं देखा था। एक दिन दोपहर में एक तोता जोर से चिल्लाते हुए उड़ रहा था, "बड़ी सुंदर युवती है, अत्यंत सुंदर युवती है!" सिपाही, जो लंबे समय से स्त्री की झलक के लिए तरस रहे थे, अपनी बंदूकें छोड़कर उस तोते का पीछा करने लगे। वे झाड़ियों को पार करते हुए उस जगह पहुंचे, जहां तोता उड़ते-उड़ते रुका था। पर वहां कोई युवती नहीं थी। वहां एक मादा तोता थी, जिसकी ओर वह नर तोता आकर्षित था। सिपाही अपना सिर पीटते हुए सोचने लगे कि वे किस नासमझी में पड़ गए! यह घटना एक महत्वपूर्ण सत्य को उजागर करती है। नर तोता मादा तोते में रस अनुभव करता है, लेकिन सिपाहियों के लिए उसमें कोई आकर्षण नहीं था। इसी प्रकार, पुरुष को स्त्री में और स्त्री को पुरुष में रस मिलता है। यह रस बाहरी नहीं होता, बल्कि हमारी अपनी भावदशा में होता है। जैसे, बुखार के बाद स्वादिष्ट भोजन भी बेस्वाद लगता है, क्योंकि हमारी जीभ की स्वाद लेने की क्षमता बदल जाती है। भोजन में स्वाद नहीं होता, स्वाद हमारी जीभ की क्षमता ...